शिमला,हिमशिखा न्यूज़ 16/02/2022
कोई भी नाकाम प्रशासन अपनी ही सरकार की निष्क्रियता का प्रमाण होता है।
शिमला में न आरटीओ न कोई ट्रैफिक नियमावली। सभी रामजी के भरोसे…?

शिमला में चल रही प्राइवेट बसों द्वारा सरकार द्वारा तय किए गए नियमों की धज्जियां उड़ाने की करेंगे। दिन भर कई सौ निजी बसें, खचाखच सवारियों से भरी हुई, उनके बीच धक्के खाते वरिष्ठ नागरिक और सीटों पर अपने एंड्रॉयड से खेलते युवा और सरकारी नियमों की अनदेखी करते बसों के चालक। हर बस में SCP यानि स्पेशल कैटेगरी पैसेंजर का सरकारी नियमों के साथ चिपका बोर्ड….सरकार की अपनी ही हंसी उड़ाता….मान लेना चाहिए कि जब न आरटीओ, न परिवहन के दूसरे अधिकारी कभी इन बसों के भीतर के हाल न देखें, अपनी सरकार के ही नियमों की धज्जियां उड़ते न देखें….उस शहर में न प्रशासन है न सरकार….आम नागरिक राम जी के हवाले…? बसें गौ शालाओं से भी बद्दत्तर, ऊंची इतनी कि कोई भी वरिष्ठ नागरिक, विशेषकर महिलाएं तो चढ़ ही न सकें….क्या RTO ऑफिस को इन बसों के हाल नहीं पता….इनकी ऊंचाइयों का नहीं पता…..अपने बनाए नियमों का नहीं पता……तो फिर सरकार इस दफ्तर को बंद क्यों नहीं कर देती…..? ट्रैफिक पुलिस भी तो है….लेकिन उनका काम शायद दांए बांए, ऊपर नीचे, आगे पीछे करना ही रह गया होगा या फिर VVIPs की गाड़ियों को ट्रैफिक रोक रोक कर साफ सुथरे ढंग से निकलना….सरकार खुश, अधिकारी खुश तो ट्रैफिक नियम दुरुस्त।
ट्रैफिक पुलिस भी तो है….लेकिन उनका काम शायद दांए बांए, ऊपर नीचे, आगे पीछे करना ही रह गया होगा या फिर VVIPs की गाड़ियों को ट्रैफिक रोक रोक कर साफ सुथरे ढंग से निकलना….सरकार खुश, अधिकारी खुश तो ट्रैफिक नियम दुरुस्त।
सरकार RTO और ट्रैफिक विभाग को कहो तो वे आम जनता की सुविधा के लिए हैं, आंखें मूंद कर दफ्तरों में ऊंघते रहने के लिए नहीं। क्यों नहीं इन बसों के हालात देखते, क्यों इतनी ऊंची है इनकी बॉडी और सीढियां, क्यों वरिष्ठ नागरिकों को नहीं मिल रही सीटें, क्यों तय मापदंडों के मुताबिक नहीं है इनकी बैठने की सीटें….? आखिर इन सभी सहानुभूतियों के पीछे काला काला आखिर चल क्या रहा होता है…..? आप जब किराया बढ़ा रहे होते हैं तो आंखें बंद होती होंगी, तब क्यों नहीं पूछते इस निजी ऑपरेटरों से कि सुविधाएं तो जीरो हैं…..ऐसी बसों के क्यों नहीं होते लाइसेंस रद्द।
आभारी हैं हम एचआरटीसी के, जिसे बंद करवाने पर पूरी सरकारी ताकत लगी रहती है कि उनकी बसें बहुत सुविधाजनक तो है पर सफाई के हाल उनके भी बुरे हैं। और सुविधा के नाम पर दस बीस सरकारी बसों के बाद या पीछे एक सरकारी बस। निजी निजी के लिए बढ़िया षडयंत्र…?
सच कहूं कोई प्रशासन नहीं, कोई आरटीओ नहीं, कोई ट्रैफिक पुलिस नहीं….फिर सरकार भी कहां रही।
शिमला से एसआर हरनोट की कलम से