शिमला,हिमशिखा न्यूज़ 19/06/2022
तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव ‘उन्मेष’ का समापन
समाज का कद बढ़ता है, साहित्यकारों से – राजेंद्र विश्वासनाथ आर्लेकर
देश-विदेश के 425 से अधिक साहित्यकारों ने 65 विभिन्न कार्यक्रमों में लिया भाग
60 से अधिक भाषाओं का हुआ प्रतिनिधित्व
शिमला। 18 जून 2022; तीन दिनों से हिमाचल की राजधानी शिमला में चल रहे देश के सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव का आज समापन हुआ। समापन सत्र के मुख्य अतिथि हिमाचल प्रदेश के माननीय राज्यपाल श्री राजेंद्र विश्वासनाथ आर्लेकर ने गेयटी थियेटर के मुख्य सभागार में उपस्थित साहित्यकारों को संबोधित करते हुए कहा कि साहित्यकारों से किसी भी समाज का कद बढ़ता है, और मुझे खुशी है कि हिमाचल प्रदेश की राजधानी को इस भव्य समारोह का मेजबान बनने का मौका मिला। आगे उन्होंने कहा कि समाज को दिशा देने वाला साहित्य ही सच्चा साहित्य होता है। उन्होंने साहित्यकारों से अपील की कि वे उन स्वतंत्रता सेनानियों के जीवन को भी लेखन का आधार बनाएँ जिन्हें समाज ने विस्मृत कर दिया है। उन्होंने कार्यक्रम में शामिल हुए गुलज़ार के उस कथन का भी समर्थन किया जिसमें उन्होंने कहा था कि पटकथा को साहित्य माना जाना चाहिए। उन्होंने बच्चों में पुस्तक पढ़ने की रुचि विकसित करने के लिए माता-पिता और साहित्यकारों से आगे आने का आह्वान किया।
समारोह के प्रारंभ में साहित्य अकादेमी के उपाध्यक्ष माधव कौशिक ने कहा कि इतना बड़ा सफल आयोजन बिना हिमाचल प्रदेश सरकार के सहयोग के बिना संभव नहीं था। इसके लिए उन्होंने सभी स्थानीय सहयोगी संस्थाओं को विशेष धन्यवाद देते हुए कहा कि इस सहयोग से प्रोत्साहित होकर हम आगे भी इस तरह के बड़े आयोजन कर पाने में समर्थ होंगे। समापन समारोह में साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष चंद्रशेखर कंबार, हिमाचल प्रदेश सरकार के भाषा एवं संस्कृति विभाग के निदेशक राकेश कंवर भी उपस्थित थे। अंत में साहित्य अकादेमी के सचिव के. श्रीनिवासराव ने सभी प्रतिभागियों एवं श्रोताओं के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।
आज के कुछ प्रमुख कार्यक्रमों में मैं क्यों लिखता/लिखती हूँ विषयक परिचर्चा की अध्यक्षता करते हुए प्रख्यात गुजराती साहित्यकार एवं साहित्य अकादेमी के महत्तर सदस्य रघुवीर चौधरी ने कहा कि मेरा प्रथम प्रेम कविता ही है। मेरे लिए लिखना ही जीवन है और मैं जीने के लिए ही लिखता हूँ। उन्होंने पत्रकारिता द्वारा भी अपने सृजन अनुभव के समृद्ध होने की बात कही। एक अन्य बहुभाषी रचना-पाठ और मेरे लिए कविता के मायने? विषयक सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रख्यात हिंदी कवि अरुण कमल ने कहा कि ‘‘पत्थर के भीतर से पानी की आवाज को भी पकड़ लेना कविता है’’। कविता मृत्यु से जीवन की तरफ लाती है और हमारी भाषाओं का सुंदर संगीत खोजती है। आगे उन्होंने कहा कि लोकगीत हमारी प्राथमिक कविताएँ हैं और उनमें हमारे समय की गति को समझा जा सकता है।
आज आयोजित हुए 23 विभिन्न कार्यक्रमों में शामिल हुए कुछ प्रमुख साहित्यकार और विद्धान थे – केरल के माननीय राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद ख़ान, मृदुला गर्ग, गीतांजलि श्री, जेरी पिंटो, विश्वास पाटिल, चिन्मय गुहा, रीता कोठारी, चमन लाल गुप्त, रमेश आर्य, अभिराज राजेंद्र मिश्र, संजुक्ता दास गुप्ता, वाई.डी. थोंगछी, अष्टभुजा शुक्ल, सुदर्शन वशिष्ठ, एस.आर.हरनोट आदि। समारोह के अंतिम दिन एक अन्य महत्त्वपूर्ण परिचर्चा – विदेशी भाषाओं में भारतीय साहित्य की अध्यक्षता अमेरिका से पधारी साहित्यकार लिंडा हेस ने की और इसमें फ्रांस, डोमिनिकल रिपब्लिक, उज़बेकिस्तान, मालदीव, श्रीलंका, बांङ्लादेश, थाइलैंड, नेपाल एवं भारत के साहित्यकारों ने अपने-अपने विचार व्यक्त किए।
आज के अंतिम सांस्कृतिक कार्यक्रम के तहत प्रख्यात दास्तानगो महमूद फ़ारूक़ी ने दास्तान-ए-कर्ण अज़ महाभारत की यादगार प्रस्तुति दी।