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शिमला, हिमशिखा न्यूज़ 17/11/2021

82वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन पर माननीय अध्यक्ष श्री विपिन सिंह परमार का स्वागत भाषण।

मेरे लिए यह अपार प्रसन्नता का अवसर है कि आज मैं अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन के शताब्दी वर्ष पर आयोजित किये जा रहे 82वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों तथा विधान परिषदों/ विधान सभाओें के सचिवों के 58वें सम्मेलन में हिमाचल प्रदेश राज्य विधान सभा के पीठासीन अधिकारी के रूप में स्वागत सम्बोधन के लिए इस ऐतिहासिक सदन में खड़ा हूं। हम सभी जो इस सदन में इस ऐतिहासिक सम्मेलन में शामिल हैं सौभाग्यशाली हैं तथा शताब्दी वर्ष के इस कार्यक्रम में इतिहास का हिस्सा बनने जा रहे हैं। शताब्दी वर्ष समारोह होने के कारण 16 से 19 नवम्बर, 2021 की यह ऐतिहासिक तिथियां भी हमेशा अविस्मरणीय रहेगी।
आज इस सम्मेलन के शुभारम्भ अवसर पर देश के यशस्वी प्रधानमंत्री तथा विलक्षण प्रतिभा के धनि एवं कार्यसाधक राजनेता श्री नरेन्द्र मोदी जी वर्चुअली हमारे साथ जुड़ रहे है, हमें आर्शीवाद दे रहे हैं। मैं हृदय से प्रधानमंत्री जी का अभिनन्दन एवं स्वागत करता हूं।
मैं इस ऐतिहासिक एवं गौरवपूर्ण अवसर पर अपार ऊर्जा के स्त्रोत, मार्गदर्शक एवं आदर्श श्री ओम बिड़ला जी,चेयरमैन अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन एवं माननीय अध्यक्ष लोक सभा का तह दिल से अभिनन्दन एवं स्वागत करता हूं तथा शताब्दी वर्ष में इस आयोजन को शिमला आहूत करने के लिए भी कोटी-कोटी धन्यवाद करता हूं। मैं आज के समारोह में विशेष रूप से शामिल तथा मंच पर बैठे राज्य सभा के माननीय उप-सभापति, आदरणीय श्री हरिवंश जी, माननीय मुख्यमंत्री हिमाचल प्रदेश श्री जय राम ठाकुर जी, नेता प्रतिपक्ष श्री मुकेश अग्निहोत्री जी, हिमाचल प्रदेश विधान सभा के माननीय उपाध्यक्ष डॉ0 हंस राज जी का भी हृदय से स्वागत करता हूं।

इस सम्मेलन में भाग ले रहे सभी राज्य विधान सभाओं/ विधान परिषदों के
पीठासीन अधिकारियों, उपाध्यक्षों, हिमाचल प्रदेश विधान सभा के सभी माननीय सदस्यगणों, लोक सभा तथा राज्य सभा के महासचिव, सभी राज्य विधान सभाओं/ विधान परिषदों के सचिव, अन्य प्रतिभागियों तथा इस कार्यक्रम से जुड़े लोक सभा के सभी वरिष्ठ अधिकारियों, हिमाचल प्रदेश सरकार तथा हिमाचल प्रदेश विधान सभा के सभी वरिष्ठ अधिकारियों तथा पत्रकार दीर्धा में बैठे मिडिया के सभी वरिष्ठ साथियों का भी हार्दिक अभिनन्दन एवं स्वागत करता हूं।
आज से 100 वर्ष पूर्व जब भारत स्वतंत्र भी नही हुआ था देश की ग्रीष्मकालीन राजधानी एवं रमणीय पर्यटक स्थल शिमला में 14 व 16 सितम्बर, 1921 को प्रथम अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन को आयोजित किया गया था। उसी को सुस्मरण करते हुए इस सम्मेलन को शताब्दी समारोह के रूप में यहां आयोजित किया गया है और सदन के अन्दर मौजूद हम सभी सौभाग्यशाली है कि हम सभी उसके गवाह बनने जा रहे है। इसलिए इस समारोह की अपनी गरिमा तथा विशेष महत्व है।
14 व 16 सितम्बर, 1921 को शिमला में आयोजित अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों का सम्मेलन लोकतंत्रिक प्रणाली को मजबूती प्रदान करने की दृष्टि से अनुभवों, नए विचारों और नवाचारों को सांझा करने में एक सशक्त मंच सिद्ध हुआ है। भारत के प्रति ब्रिटिश सरकार की नीति की घोषणा 20 अगस्त, 1917 के परिणामस्वरूप संवैधानिक सुधारों की एक योजना भारत सरकार के एक अधिनियम 1919 में शामिल हुई। ब्रिटिश संसद की संयुक्त समिति जो 1919 के सुधार विधेयक से सम्बन्धित थी ने केन्द्रीय विधान मण्डल के लिए एक प्रेजिडेंट की नियुक्ति की सिफारिश कर महसूस किया कि वह प्रांतीय परिषदों के अध्यक्षों का मार्गदर्शक और सलाहाकार होना चाहिए तथा उसका चुनाव इस दृष्टि से किया जाए ताकि उसका समग्र प्रभाव भारत में संसदीय प्रक्रिया के इतिहास पर भी रहे।

हाऊस ऑफ कॉमन के पूर्व सदस्य सर फ्रेडेरिक व्हाईट को उनकी संसदीय प्रक्रिया में गहन ज्ञान तथा क्षमताओं के लिए केन्द्रीय विधान मण्डल के प्रथम प्रेजिडेंट के रूप में इस उच्च पद पर मनोनीत किया गया तथा उन्होंने भारत में सुदृढ़ तथा स्वस्थ लोकतांत्रिक परम्परायें स्थापित करने के लिए बहुत कुछ किया। प्रजिडेंट व्हाईट ने केन्द्रीय विधान मण्डल के लिए प्रेजिडेंट (अब पीठासीन अधिकारी) और 1921 में प्रांतों के विधान परिषदों के अध्यक्षों (अब पीठासीन अधिकारी) व उपाध्यक्षों (अब उपाध्यक्ष) के सम्मेलन की नींव रखी तथा 14 व 16 सितम्बर, 1921 के पहले सम्मेलन की अध्यक्षता की।
वर्ष 1926 के बाद सम्मेलन की अध्यक्षता एक निर्वाचित प्रेजिडेंट द्वारा की गई। 1925 में विठ्ठल भाई पटेल ने ब्रिटिश नॉमिनी को 2 मतों से पराजित कर स्वराज पार्टी के उम्मीदवार के रूप में केन्द्रीय विधान मण्डल का पहला निर्वाचित भारतीय प्रेजिडेंट बनने का गौरव इसी सदन में प्राप्त किया। 1925 में सर फ्रेडरिक व्हाईट का उत्तराधिकारी बनने के बाद वर्ष 1926 में सम्मेलन पर अपने विचार व्यक्त करते हुए विठ्ठल भाई पटेल ने कहा था कि मनोनीत अध्यक्ष के स्थान पर निर्वाचित अध्यक्ष के आने से यह सम्मेलन विकास के नए चरण में पहुच गए हैं। इस विषय पर ध्यान देते हुए उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि निर्वाचित अध्यक्ष होने के नाते उन्हें अपने सभी सदस्यों को जितना सम्भव हो उनकी “चाहतों और इच्छाओं” को पूरा करने का प्रयास करना चाहिए तथा मौजूदा विधियों, नियमों और आदेशों को इस रूप में लागू करने की उद्वार सभावनायें तलाशने का कार्य करना चाहिए ताकि वह अपने उद्देश्यों में स्थिर रहें तथा संसदीय जीवन की सुस्थापित परम्पराओं को हानि न पहुंचा सके। अपने कार्यकाल के दौरान चारों सम्मेलनों में प्रेजिडेंट विठ्ठल भाई पटेल ने जहां सर फ्रेडरिक व्हाईट के व्यापक और उद्वार दृष्टिकोण को बनाये रखा वहीं विधायिका के अधिकार को बढ़ाने के लिए कड़ी मेहनत की तथा अध्यक्ष के पद की स्वतन्त्रता तथा मजबुती के लिए जोर दिया।

वर्ष 1937 में प्रांतीय स्बायत्तता के साथ एक नए युग की शुरूआत हुई जिसमें प्रांतीय विधानमण्डल के पास पहले की अपेक्षा लोकतांत्रिक विधायिकाओं से सम्बन्धित व्यापक शक्तियाँ व कार्य एक जिम्मेदार सरकार के अधीन आ गई। यह केवल स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात तथा केन्द्र व राज्य में एक पूर्ण संसदीय स्वरूप वाली सरकार की स्थापना के साथ सम्भव हो पाया कि पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलनों में चर्चा को ज्यादा महत्व दिया जाने लगा। जी0 वी0 मावलांकर को 1946 में केन्द्रीय विधान मण्डल का अध्यक्ष चुना गया तथा बाद में वह लोकसभा के पहले अध्यक्ष बने। उन्होंने 1946 से 1956 तक सम्मेलनों का मार्गदर्शन किया तथा इस अवधि के दौरान सम्मेलन द्वारा भारत में संसदीय लोकतंत्र की मजबूत नींव रखी गई। 1946 तक सम्मेलन नियमित रूप से आयोजित नहीं किये जाते थे। इसकी महत्ता को समझते हुए मालवांकर सालाना सम्मेलन करवाने के पक्षधर थे। नवम्बर, 1955 में शिलांग में आयोजित वार्षिक सम्मेलनों की उपयोगिता पर बोलते हुए मालवांकर ने कहा था कि यह विधानमण्डलों के पीठासीन अधिकारियों के लिए आवश्यक है वह सालाना सम्मेलनों के माध्यम से मिलें तथा समय- समय पर जायजा लें तथा तुल्नात्मक विश्लेषण के माध्यम से लोकतंत्र के कार्य में आ रही विशेष कठिनाईओं को समझने पर चर्चा करें तथा पारस्परिक अनुभव से जो लाभ हुआ है व जो धारणायें समय-समय पर स्थापित की हैं क्या वह मजबूत है या नहीं पर भी चर्चा करें। शिमला एवं दिल्ली 1921 से 1950 तक के आयोजित सम्मेलनों का स्थल हुआ करते थे । मलावांकर ने सुझाव दिया कि सम्मेलन का उद्देश्य ज्यादा बेहतर होगा यदि इसका आयोजन अलग-अलग राज्यों में किया जाये। उनका मत था कि पीठासीन अधिकारी ऐसा करने से न केवल व्यक्तिगत रूप से लाभांवित तथा परिचित होगें बल्कि राष्ट्रीय एकता को बढ़ाने में भी वह कामयाब होंगे । उनके इस सुझाव को राज्य विधान सभाओं के सभी पीठासीन अधिकारियों द्वारा स्वीकार किया गया था तब से इसका

आयोजन अलग-अलग स्थलों पर होने लगा है। वर्ष 1951 में इस तरह का पहला सम्मेलन जुलाई- अगस्त महीने में त्रिवेन्द्रम में आयोजित किया गया।
अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों का शिमला में आयोजित किये जाने वाला यह 7वां सम्मेलन है। इससे पूर्व 1921, 1926, 1933,1939,1976,1997 में 6 सम्मेलन आयोजित किये जा चुके है । हिमाचल प्रदेश विधान सभा का कौंसिल चैम्बर शताब्दी वर्ष 2021 में 82वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन को इतिहास के पन्नों में समेटने के लिए आत्तुर है। कौंसिल चैम्बर इमारत एक ऐतिहासिक धरोहर है जो ब्रिटिशकाल से लेकर आज तक कई महत्वपूर्ण घटनाओं की गवाह रही है। इसका इतिहास अत्यन्त गौरवमयी, अतुलनीय तथा अविस्मरणीय रहा है। इस माननीय सदन को भूतकाल में विठ्ठल भाई पटेल, मोतीलाल नेहरू, लाला लाजपत राय जैसी महान विभूतियों ने अपने उच्च विचारों तथा प्रेरणामयी वाणी से सम्बोधित किया है। यहां अपना सम्बोधन देना मेरे लिए किसी स्वप्न से कम नहीं है।
कौंसिल चैम्बर भवन ब्रिटिशकालीन स्थापत्य एवं वास्तुकला को प्रदर्शित करने वाली निर्मित अन्तिम महत्वपूर्ण इमारत है जिसे मिस्टर डब्ल्यू० जॉर्ज द्वारा डिजाइन किया गया था। इस ऐतिहासिक भवन का निर्माण तत्कालीन ब्रिटिश सरकार द्वारा ग्रीष्मकालीन राजधानी शिमला में Central Legislative Assembly की बैठकों को आयोजित करने के लिए किया गया था। इसका निर्माण वर्ष 1920 में प्रारम्भ हुआ तथा 27 अगस्त, 1925 को वायसराय लॉर्ड रीडिंग द्वारा इसका उद्घाटन किया गया।
वर्ष 1925 में विट्ठल भाई पटेल ने स्वराज पार्टी के उम्मीदवार के रूप में ब्रिटिश नॉमिनी को 2 मतों से पराजित कर Central Legislative Assembly के प्रथम भारतीय President(अध्यक्ष) बनने का श्रेय इसी भवन में प्राप्त किया था। 22 सितम्बर, 1928 को केन्द्रीय विधान मण्डल का अलग सचिवालय बनाने का संकल्प इसी भवन में पारित किया गया

जिसका प्रस्ताव पंडित मोती लाल नेहरू द्वारा प्रस्तुत किया गया तथा लाला लाजपत राय द्वारा अनुमोदित किया गया। इस भवन में सुशोभित टीकवुड से निर्मित आसन वर्ष 1925 में तत्कालीन बर्मा सरकार द्वारा President, केन्द्रीय विधान मण्डल को उपहार स्वरूप प्रदान किया गया था जिस पर बैठकर आज भी विधान सभा अध्यक्ष विधान सभा की कार्यवाही का संचालन करते आ रहे हैं।
इसी सदन में पंडित मोती लाल नेहरू ने वर्ष 1925 में लाला लाजपत राय द्वारा अनुमोदित भारतीय महिलाओं को वोट के अधिकार का प्रस्ताव लाया। इसके अलावा सबसे महत्वपूर्ण “हिमाचल प्रदेश माता-पिता और आश्रित भरण-पोषण विधेयक, 2001” को पारित करने वाला भी हिमाचल प्रदेश देश का पहला राज्य बना। इस सभा द्वारा अगस्त, 2021 तक 1339 विधेयक पारित किए जा चुके हैं।
संयोग से यह वर्ष हम पूर्ण राज्यत्व के स्वर्णिम वर्ष के रूप में भी मना रहे है। आज से ठीक 50 वर्ष पहले 25 जनवरी, 1971 को हिमाचल प्रदेश भारतीय गणराज्य का 18वां राज्य बना था। पूर्ण राज्यत्व के स्वर्णिम वर्ष के उपलक्ष पर हमनें एक दिवसीय सत्र भी आयोजित किया था जिसे भारत के माननीय राष्ट्रपति श्री राम नाथ कोविंद जी ने सम्बोधित किया था। इससे पूर्व 23 दिसम्बर, 2004 को पूर्व राष्ट्रपति डॉ0 ए0 पी0 जे0 अब्दुल कलाम तथा 24 मई, 2013 को पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी भी इस माननीय सदन में अपना सम्बोधन दे चुके हैं।
हिमाचल प्रदेश देव भूमि व वीर भूमि के नाम से विख्यात है । यहां देवी -देवताओं के कई मन्दिर हैं। जिसमें खास बात यह है कि इस प्रदेश में हर गांव में कम से कम एक मन्दिर जरूर है । हिमाचल में ऐसा कोई उत्सव नही होता है जोकि स्थानीय देवता के बिना पूर्ण हो। यहां से भारतीय सेना में बहुत से सैनिक सेवायें दे चुके हैं और बहुत सारे जवान सेवायें दे रहे है।

यहां से चार परमवीर चक्र विजेता रहे हैं। कांगड़ा जिला के मेजर सोमनाथ शर्मा ने पहला परमवीर चक्र मेडल हासिल कर हिमाचल के साहस की पहचान को शिखर पर पहुंचाया था। मेजर सोमनाथ ही नहीं, पालमपुर के कैप्टन विक्रम बत्रा, धर्मशाला के लेफ्टिनेंट कर्नल डीएस थापा और बिलासपुर के राइफलमैन संजय कुमार समेत प्रदेश के चार वीरों ने परमवीर चक्र हासिल कर अदम्य साहस की परंपरा को आगे बढ़ाया।
4 अगस्त, 2014 को हिमाचल प्रदेश विधान सभा ई-विधान प्रणाली लागू करने वाली देश की सर्वप्रथम विधान सभा बन गई । ई-विधान प्रणाली लागू होने से जहां सैंकड़ों वृक्ष प्रतिवर्ष कटने से बचाये गये हैं वहीं समय की बचत, कार्य में दक्षता व पारदर्शिता आई है। पेपर लैस प्रणाली लागू होने के बाद से सदन से संबंधित सभी दस्तावेज माननीय सदस्यों को उनकी टेबल और मोबाइल ऐप पर स्थापित टच स्क्रीन के माध्यम से ऑनलाइन उपलब्ध कराए जाते हैं। माननीय विधायकों के लिए मोबाईल ऐप के माध्यम से ई-निर्वाचन क्षेत्र प्रबन्धन की व्यवस्था की गई है। विधायक अपने मोबाईल ऐप के माध्यम से जनता तथा अधिकारियों से सीधा संवाद कर सकते हैं तथा समय-समय पर कार्य प्रगति की समीक्षा कर सकते है। ऐसा करने से हमारा उदेश्य सभी विधायकों को नवीनतम सूचना प्रोद्योगिकी का उपयोग करने और आई0टी0 उपकरणों की मदद से अपने संबंधित निर्वाचन क्षेत्रों के प्रबन्धन के लिए पर्याप्त कुशल बनाना है ।
हम सभी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के डिजिटल इंडिया अभियान के उज्जवल भविष्य के लिए सभी राज्यों के सांसदों , विधायकों और वरिष्ठ अधिकारियों केा प्रशिक्षित करने, सुविधा प्रदान करने और शिक्षित करने के लिए धर्मशाला स्थित तपोवन विधान सभा भवन में राष्ट्रीय ई -विधान अकादमी Neva की स्थापना हेतु प्रयासरत है और मैं पुन: आप से आग्रह करता कि आप इसमें अपना आर्शीवाद देकर इसे मंजूरी प्रदान करने की कृपा करें ।

अंत में मैं एक बार पुन: अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों के इस शताब्दी समारोह में शामिल होने के लिए सम्मेलन के चेयरमैन एवं लोक सभा के माननीय अध्यक्ष श्री ओम बिड़ला जी, माननीय उप-सभापति श्री हरिवंश जी, माननीय मुख्यमंत्री हिमाचल प्रदेश श्री जय राम ठाकुर जी, नेता प्रतिपक्ष श्री मुकेश अग्निहोत्री जी, तथा उपाध्यक्ष हिमाचल प्रदेश विधान सभा डॉ0 हंस राज जी का हार्दिक धन्यवाद करता हूं तथा साथ ही इस सम्मेलन में भाग लेने, संवाद करने , अपना बहुमुल्य सुझाव एवं सम्बोधन देने तथा अपने विचार सांझा करने आये विभिन्न विधान सभाओं/ विधान परिषदों के पीठासीन अधिकारियों, उपाध्यक्षों , लोक सभा तथा राज्य सभा के महासचिवों, राज्य विधान परिषदों/ विधान सभाओं के सचिवों व लोक सभा तथा हिमाचल प्रदेश सरकार , हिमाचल प्रदेश विधान सभा के अधिकारियों तथा मिडिया के साथियों का भी धन्यवाद करता हूं तथा सम्मेलन की कामयाबी के लिए अपनी अनन्त शुभकामनायें देता हूं।

By HIMSHIKHA NEWS

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